गुरु को ईश्वर से भी ऊंची पदवी क्यों दी, जानिए ये हैं प्रमुख कारण

गुरु पूर्णिमा का पावन महापर्व पूरे देश में धार्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। मंदिर, मठ और आश्रमों में भक्ति, भाव, त्याग और समर्पण का अनूठा संगम दिखाई दिया। 

गुरु पूर्णिमा का पावन महापर्व पूरे देश में धार्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। मंदिर, मठ और आश्रमों में भक्ति, भाव, त्याग और समर्पण का अनूठा संगम दिखाई दिया। भक्तों की गुरु पूजन के समय भावना देखते ही बनती थी। सबकुछ समर्पण कर गुरु के शरणागत हो जाना चाहते थे। गुरु ने भी अपने शिष्यों को शुभाशीष देकर जीवन में सदैव भक्ति मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। 
काशी के श्री शंकराचार्य आश्रम, पंचकोसी मार्ग, ग्राम-देउरा में गुरु पूर्णिमा महोत्सव भक्ति भाव के साथ मनाया गया। सबसे पहले चतुर्वेद स्वस्तिवाचन, सुप्रभातम्, भगवान शशांक शेखर शिव के रुद्राभिषेक, जगज्जननी जगदम्बा त्रिपुर सुन्दरी के चक्रार्चन, श्री काशी सुमेरु पीठ के 62 गुरुओं (शंकराचार्यों) के गुरु मण्डल पूजन से प्रारम्भ हुआ। पूरे देश से आए शिष्यों, भक्तों एवम् श्रद्धालुओं ने सद्गुरुदेव श्री काशी सुमेरु पीठाधीश्वर अनन्त श्री विभूषित पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज का वैदिक विधि-विधान से पूजन किया।

सदैव प्रकाश की ओर ले जाता है गुरु

 पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने कहा कि शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है क्योंकि गुरू अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। दो अक्षरों से मिलकर बने 'गुरु' शब्द का अर्थ - प्रथम अक्षर 'गु का अर्थ- 'अंधकार' होता है जबकि दूसरे अक्षर 'रु' का अर्थ- 'उसको हटाने वाला' होता है।  अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरु' कहा जाता है। गुरु वह है, जो अज्ञान का निराकरण करता है, अथवा गुरु वह है जो धर्म का मार्ग दिखाता है। श्री सद्गुरु आत्म-ज्योति पर पड़े हुए विधान को हटा देता है। गुरु तत्व की प्रशंसा तो सभी शास्त्रों ने की है।  ईश्वर के अस्तित्व में मतभेद हो सकता है, किन्तु गुरु के लिए कोई मतभेद आज तक उत्पन्न नहीं हो सका। गुरु को सभी ने माना है । प्रत्येक गुरु ने दूसरे गुकोआदर प्रशंसा एवं पूजा सहित पूर्ण सम्मान दिया है।
  

शास्त्र वाक्य में गुरु को माना गया है ईश्वर

भारत के बहुत से संप्रदाय तो केवल गुरुवाणी के आधार पर ही कायम हैं। अपनी महत्ता के कारण ही गुरु को ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया गया है। शास्त्र वाक्य में गुरु को ही ईश्वर के विभिन्न रूपों- ब्रह्मा, विष्णु एवम् महेश्वर के रूप में स्वीकार किया गया है। गुरु को ब्रह्मा कहा गया क्योंकि वह शिष्य को बनाता है नव जन्म देता है। गुरु, विष्णु भी है, क्योंकि वह शिष्य की रक्षा करता है, गुरु, साक्षात महेश्वर भी है क्योंकि वह शिष्य के सभी दोषों का संहार भी करता है। सन्त कबीर ने भी कहा है-

'हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर॥' 

अर्थात भगवान के रूठने पर तो गुरू की शरण से रक्षा हो सकती है, किन्तु गुरू के रूठने पर कहीं भी शरण मिलना सम्भव नहीं है । जिसे सनातन धर्मावलम्बियों ने आचार्य, बौद्धों ने कल्याण मित्र, जैनों ने तीर्थंकर और मुनि, नाथों तथा वैष्णव सन्तों और बौद्ध सिद्धों ने उपास्य सद्गुरु कहा है, उस श्री गुरू से उपनिषद् की तीनों अग्नियाँ भी थर-थर काँपती हैं। पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने सभी सनातन धर्मावलम्बियों को मंगलमय एवम् सफल जीवन का आशीर्वाद प्रदान किया।

सनातन की जड़े हैं बहुत गहरी

 पूज्य शंकराचार्य जी महाराज के शिष्य विश्वगुरु स्वामी करुणानन्द सरस्वती ने कहा कि गुरु के शरण में जाकर सारी समस्याएं निर्मूल हो जाती हैं। स्वामी बृजभूषणानन्द रस्वती ने कहा कि दुनिया में एकमात्र भारत ही देश है, जहां गुरु का पूजन होता है। इससे पता चलता है कि सनातन की जड़े कितनी गहरी है। हम सभी का सौभाग्य है कि हमारे जीवन में गुरु का आशीर्वाद है।स्वामी प्रकृष्टानन्द सरस्वती, स्वामी निशच्चलानन्द , मिथलेश दीक्षित, बंस गोपाल तिवारी, सन्दीप अग्रवाल, अधिवक्ता छमाशंकर उपाध्याय सहित ने पूजन किया। इसके बाद बड़ी संख्या में भक्तों ने प्रसाद ग्रहण किया।