गुरु पूर्णिमा का जीवन में क्या है महत्व, कैसे बन सकते हैं आप महान?

गुरु पूर्णिमा पर हम गुरु के शरण में जाते हैं, मगर हमें किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ये जानना बहुत जरूरी है।

गुरु पूर्णिमा पर हम गुरु के शरण में जाते हैं, मगर हमें किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ये जानना बहुत जरूरी है। सुदामा कुटी के संत और कथा वाचक सौमित्र दास महाराज ने कहा कि जिनके जीवन में गुरु नहीं उनका जीवन निरर्थक है। इसलिए यदि आप सनातनी हैं तो सबसे पहले गुरु बनाएं, गुरु के शरण में जाएं, फिर आप समझिए कि आपका जीवन सफल हो जाएगा। गुरु दो शब्दों से मिलकर बना है। पहला शब्द गु मतलब अंधकार और दूसरा शब्द रु, मतलब प्रकाश। इसका पूरा अर्थ हुआ जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए वो गुरु है। सौमित्र दास महाराज ने कहा कि हमारे यहां तो भगवान ने भी अपना गुरु बनाया। भगवान श्रीराम के जीवन में गुरु वशिष्ठ और गुरु विश्वामित्र थे, जिन्होंने उन्हें समय समय पर सही मार्ग दिखाया। भगवान श्रीकृष्ण के गुरु संदीपनी ऋषि थे। आप सोच सकते हैं जब तीनों लोकों के मालिक गुरु की शरण में जा रहे हैं तो फिर हमें क्यों नहीं जाना चाहिए? इसलिए प्रत्येक सनातनी को अपने जीवन में गुरु जरूर बनाना चाहिए। सौमित्र दास ने कहा कि गुरु के शरण में यदि आप जाते हैं तो अंहकार, लोभ, मोह सभी का त्याग कर देना चाहिए। सिर्फ त्याग, समर्पण और भक्ति ही होनी चाहिए। 

जीवन में कभी नहीं आएगा भटकाव

सौमित्र दास महाराज कहते हैं कि यदि आपके जीवन में सच्चे गुरु हैं  तो फिर कभी भटकाव नहीं आ सकता है। आज लोग बहुत बड़े बड़े कारोबार कर रहे हैं, मल्टीनेशनल कंपनियों में नौकरी कर रहे हैं। अच्छी सेलरी है। सारी सुख सुविधाएं हैं पर जीवन में सुख और शांति नहीं है। भटकाव है। जीवन उथल पुथल से भरा हुआ है। इसका मूल कारण है कि ऐसे लोग गुरु के शरण में नहीं होते हैं। इसलिए जीवनभर भटकते रहते हैं। गुरु ही एकमात्र हैं जो इन संकटों से पार लगा सकते हैं। गुरु का जीवन निस्वार्थ भाव से भरा होता है। वह दया के सागर होते हैं, क्षमाशील होते हैं। अपने शिष्य के जीवन को तार देते हैं। जीवन को सद्मार्ग की ओर मोड़ देते हैं। 

किस उम्र में बनाना चाहिए गुरु

 सौमित्र दास कहते हैं कि लोगों के मन में यह धारणा रहती है जब आधी उम्र बीत जाए या बुजुर्ग हो जाएं तब वह गुरु मंत्र लें। तब अपने जीवन में गुरु बनाएं। मगर यह सर्वथा अनुचित है। गुरु कब बनाना चाहिए यह ध्यान देने वाली बात है, जिस प्रकार से हम बच्चे को स्कूल में एडमिशन दिलाने के लिए बेचैन रहते हैं। बच्चा ढाई, तीन साल का होता है उसे स्कूल में दाखिला दिलाने के लिए बेचैन हो जाते हैं, उसी प्रकार से जब बच्चा सोचने और समझने लायक रहे तो फिर उसे गुरु की शरण में ले जाना प्रारंभ कर देना चाहिए। भले ही गुरु मंत्र पांच छह वर्ष की उम्र में दिलाएं, मगर धीरे-धीरे गुरु के शरण में जाकर उसे गुरु का सानिध्य जरूर प्राप्त कराना चाहिए, अगर बचपन में ही गुरु का सानिध्य मिल गया तो पूरी उम्र व्यक्ति के जीवन में भटकाव नहीं आएगा। इसलिए माता-पिता यह जान लें कि बच्चे को स्कूल में प्रवेश कराने से भी जरूरी उसका गुरु बनाना है। हम अपने सनातन परंपरा को भूल रहे हैं। इसीलिए बच्चे संस्कृति और संस्कार से दूर होते जा रहे हैं।

गुरु परंपरा को जानें और राष्ट्र रक्षा के लिए जुट जाएं

युवा संत सौमित्र दास ने कहा कि हम सबको गुरु की परंपरा को जाना चाहिए और राष्ट्र रक्षा में जुट जाना चाहिए। भगवान राम ने भी अपने गुरु की आज्ञा पाकर किशोरावस्था में ही ताड़का, मारीच जैसे राक्षसों का वध कर दिया था। रावण जैसे आताताई से लड़ने की शक्ति उन्हें गुरु कृपा से ही मिली थी। भगवान श्रीकृष्ण ने गुरु कृपा से बड़े बड़े असुरों का वध किया था। छत्रपति शिवाजी ने अपने गुरु, समर्थ गुरु रामदास के आशीर्वाद से मुगलों का मुकाबला किया था तो स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के आशीर्वाद से भारत को पूरी दुनिया में एक नई पहचान दी। इसलिए नई पीढ़ी को गुरु परंपरा को पहचानना चाहिए और भारत को एक बार पुनः दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति बनाने में सहयोग करना चाहिए। गुरु पूर्णिमा पर यदि यह संकल्प लेंगे तो हमारा जीवन सार्थक सिद्ध होगा।