ऐसे शुरू हुआ अधिक मास, इस महीने धर्म कर्म का ये है महत्व

सनातन संस्कृति में मास, तिथि  और हर एक क्षण का महत्व है, जो ग्रह नक्षत्रों से जुड़े हुए हैं। इनका एक एक पल निर्धारित होता है। इसी प्रकार से अधिक मास का भी महत्व है।

सनातन संस्कृति में मास, तिथि  और हर एक क्षण का महत्व है, जो ग्रह नक्षत्रों से जुड़े हुए हैं। इनका एक एक पल निर्धारित होता है। इसी प्रकार से अधिक मास का भी महत्व है। अधिक मास कैसे प्रारंभ हुआ, इसका क्या महत्व है और किस युग से इसकी शुरुआत हुई? इसके पीछे भी गूढ़ रहस्य छिपा हुआ है आइए, अधिक मास के मौके पर इस माह की महत्ता को जानते हैं, इसमें धर्म कर्म करना, पुण्य कार्य करना कितना फलदायी होता है।   इसके बारे में भी जानते हैं...

जब ब्रह्मा जी ने हिरण्यकश्यप को दिया वरदान

अधिक मास की शुरुआत की बहुत रोचक कथा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार सतयुग में भक्त प्रहलाद के पिता हिरण्यकश्यप ने घनघोर तपस्या की थी। उसने ब्रह्मा जी को अपनी तपस्या से प्रसन्न कर लिया और मनचाहा वरदान मांग लिया। हिरण्यकश्यप ने वरदान में मांगा की उसे न नर मार सके और न पशु। दिन में मरे न रात में, धरती पर न आसमान पर, देवता मार सके न कोई दैत्य, धरती पर न आसमान पर, दिन में न रात में, अस्त्र न शस्त्र से उसकी मृत्यु हो, इन 12 महीनों में भी उसकी मृत्यु न हो, अर्थात किसी भी तरह से उसकी मृत्यु न हो। भाव में आए ब्रह्मा जी ने हिरण्यकश्यप को तथास्तु कह दिया। वरदान मिलने के बाद हिरण्यकश्यप अपने आप को अजेय मानने लगा। उसने धरती पर अत्याचार शुरु कर दिया। यहां तक कि अपने पुत्र प्रहलाद को भी श्रीहरि का नाम लेने से मना करने लगा। कई बार प्रहलाद को मारने की कोशिश भी की।

फिर अधिक मास की गई रचना

हिरण्यकश्यप के अत्याचार से पूरी धरती कांप गई। ब्रह्मा जी भी परेशान हो गए, उन्हें लगा कि उसे ऐसा वरदान दे दिया है कि जिससे उसकी मृत्यु ही निश्चित नहीं है। क्योंकि हिरण्यकश्यप ने यह भी वरदान मांगा था कि साल के 12 महीने में से किसी भी महीने में उसकी मृत्यु ना हो। इस प्रकार ब्रह्मा जी भी बहुत असमंजस में फंस गए। अंत में भागते हुए भगवान विष्णु के पास पहुंचे। फिर भगवान विष्णु ने सभी ग्रह नक्षत्रों को अपने पास बुलाया और उनसे कहा कि इन  वर्षों में एक नए माह की रचना करो, जिससे हिरण्यकश्यप का वध किया जा सके। अंत में सभी ग्रह नक्षत्रों ने मिलकर 12 महीने से अलग एक नए माह अर्थात अधिक मास की रचना की। फिर भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार रखकर इसी अधिक मास में हिरण्यकश्यप का वध किया और धरती को पाप से मुक्त किया। इस प्रकार अधिक मास की शुरुआत हुई। तो ऐसे शुरू हुआ अधिक मास, धर्म कर्म करने से जिन फलों की प्राप्ति होती है, उन्हें आगे जानते हैं।  

 मनोवांछित फल की होती है प्राप्ति 

अधिक मास में हिरण्यकश्यप
जैसे दैत्य का वध होने के बाद से पूरी धरती पाप मुक्त हो गई। भगवान विष्णु ने स्वयं भक्त प्रहलाद को राज सिंहासन पर बिठाया और उन्हें भक्ति का आशीर्वाद दिया। इसलिए जो भी भक्त अधिक मास में भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करता है, भागवत और धार्मिक अनुष्ठान  आदि का आयोजन करता है, उसे मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

इस बार अधिक मास की यह है विशेषता

इस बार अधिक मास पर साक्षात भगवान भोलेनाथ की कृपा हुई है। सावन प्रारंभ हो चुका है, सावन के करीब 15 दिन बीतने के बाद अधिक मास की शुरुआत हो जाएगी। एक महीने पूरे अधिक मास रहेगा। फिर उसके बाद सावन की शुरुआत होगी। इसलिए सावन के मध्य में अधिक मास पड़ रहा है। पुराणों में ऐसा वर्णित है कि यह अवसर कई सौ वर्ष बाद बनता है, इसलिए सावन के मध्य में पड़ने वाले अधिक मास का धार्मिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है। इसलिए इस बार यदि आप अधिक मास में धार्मिक अनुष्ठान, पूजा पाठ, कथा, व्रत उपवास आदि करते और रखते हैं तो उसका कई गुना फल आपको प्राप्त होगा।