संत की साधना से प्रगट हुए श्री बांके बिहारी, दर्शन के समय इन बातों का रखें विशेष ध्यान

भारत ही नहीं वरन दुनिया के किसी भी देश से आप मथुरा पहुंचते हैं तो आपकी आंखों में एकाएक श्री बांके बिहारी जी की छवि समा जाती है, उनकी मनमोहक सूरत को देखकर भक्त अश्रुपात में डूब जाते

भारत ही नहीं वरन दुनिया के किसी भी देश से आप मथुरा पहुंचते हैं तो आपकी आंखों में एकाएक श्री बांके बिहारी जी की छवि समा जाती है, उनकी मनमोहक सूरत को देखकर भक्त अश्रुपात में डूब जाते हैं। बस एकटक निहारते ही रहते हैं। मानों ऐसे लगता है कि ठाकुरजी से साक्षात्कार हो रहा है। कुछ भक्त तो उनसे बातचीत करने लगते हैं तो कुछ नयनों में बसा लेना चाहते हैं। ऐसे में कृष्ण के स्वरूप श्री बांके बिहारी जी अपने भक्तों को निराश नहीं करते और उनकी सभी मनोकामना पूर्ण करते हैं। इसीलिए वृंदावन में श्री बिहारीजी के भक्तों की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है। हर दिन आस्था का सैलाब उमड़ पड़ता है। संतों का ऐसा मानना है कि श्री बांके बिहारी जी एक संत की साधना, संगीत, त्याग और समर्पण से प्रकट हुए हैं। इसलिए वह अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करते, उनकी सभी मनौतियों को पूर्ण करते हैं। आइए बांके बिहारी जी के प्राकट्य की कहानी से जुड़ते हैं....

संगीत की साधना से प्रगट हुए बिहारीजी

श्री बांके बिहारी जी को सखी संप्रदाय के महान संगीतकार भक्त और साधक स्वामी हरिदास जी ने अपनी संगीत की साधना से प्रकट किया था। स्वामी हरिदास जी का जन्म वृंदावन के राजपुर गांव में हुआ था। उनके पिताजी का नाम गंगाधर और माताजी चित्रा देवी थीं। स्वामी हरिदास जी राधा रानी की अष्ट सखियों में से एक ललिता सखी के अवतार माने जाते हैं। बचपन से ही वैराग्य में मन रमने लगा था। इसलिए घर बार छोड़कर निकुंज वन में वास करने लगे। निधिवन में आकर तपस्या में लीन रहने लगे। संगीत को साधना का आधार बनाया। उन्हें गुरू आशुधीर जी का आशिर्वाद मिला। फिर, स्वामी जी की भक्ति को मानों एक अनोखी शक्ति मिल गई। स्वामी हरिदास जी की यह साधना इतनी भाव से भरी हुई थी कि ठाकुरजी भी अपने आप को रोक नहीं सके और निधिवन में ही श्री बांके बिहारी के रूप में प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिया। उनकी मनोहारी छवि स्वामी हरिदास जी की आंखों में समा गई। वह उनके मनोहारी स्वरूप को एक टक निहारते रह गए। स्वामी जी की आंखों से निर्झर अश्रुपात होने लगा। भाव विभोर होकर बोलें, हे दीनानाथ, हे मेरे कन्हैया, हे मेरे बाल गोपाल आपने तो मुझे दर्शन देकर कृतार्थ कर दिया। मैं इस लायक नहीं था, मगर आपने मुझ पर जो कृपा की है, वह सभी भक्तों पर ऐसे ही करते रहना। इसीलिए बताया जाता है कि जो भी श्री बांके बिहारी जी के दर्शन करता है उसकी सभी मनोकामना पूर्ण होती है। 

यमुना जी के किनारे हैं विराजमान

श्री बांके बिहारी जी यमुना जी के किनारे विराजमान हैं। हालांकि, अब आबादी क्षेत्र बढ़ता चला गया इसलिए मंदिर के चारों ओर बड़ी-बड़ी इमारतें और दुकानें बन गईं। आज से करीब 50 वर्ष पहले मंदिर के एकदम निकट होकर यमुना जी बहा करती थीं। भक्तगण बिहारी जी के दर्शन करने के साथ यमुना जी का भी भावपूर्ण दर्शन करते थे। बिहारी जी का मंदिर बिहारीपुरा में स्थापित है। हालांकि, बढ़ती आबादी क्षेत्र के चलते अब यमुना जी मंदिर से करीब 500 मीटर दूर हो गई हैं। बड़ी इमारतों के चलते मंदिर से अब दर्शन भी नहीं हो पाते हैं। इसलिए अधिकांश भक्त बिहारी जी के दर्शन करने के बाद परिक्रमा मार्ग होते हुए यमुना जी के दर्शन को निकल जाते हैं। वहां, यमुना जी का भी पूजन अर्चन करते हैं। 

बिहार पंचमी के दिन प्रगट हुए बिहारी जी

स्वामी हरिदास जी की भक्ति से प्रसन्न होकर श्री बांके बिहारी जी मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को प्रकट हुए, जिसे बिहार पंचमी भी कहा जाता है। इसलिए इस दिन श्री बांके बिहारी मंदिर में भव्य उत्सव होता है। हमारे ठाकुर जी का प्राकट्य उत्सव मनाया जाता है। मंदिर में बिहारी जी को पीत वस्त्र धारण किया जाता है। आभूषण से श्रंगार किया जाता है। विभिन्न सुगंधित फूल से सज्जा की जाती है। मेवा युक्त हलवा और खीर के साथ ही 56 प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं और बड़े भाव से श्री बिहारी जी को ग्रहण कराया जाता है। यही प्रसाद स्वरूप भक्तों को बांटा जाता है। साथ ही वृंदावन में भी विभिन्न स्थानों पर आयोजन होते हैं। निधिवन से भव्य शोभायात्रा बिहारी जी मंदिर तक निकाली जाती है, जिसमें तमाम झांकियां शामिल होती हैं, बिहार पंचमी का उत्सव देखते ही बनता है।

युगल घाट की ओर से होता है प्रवेश

बिहारी जी के दर्शन के लिए लगातार भक्तों की भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने अब कुछ बदलाव किया है। पहले परिक्रमा लगाते हुए भक्तगण आते थे तो जादौन पार्किंग के पास से वह प्रवेश करते थे और मंदिर जाकर आसानी से दर्शन कर लिया करते थे। मगर अब व्यवस्थाएं बदल गईं हैं। अब युगल घाट के पास से दर्शन के लिए जाना होता है। युगल घाट के पास वृक्ष के नीचे से लंबी कतार लगती है और यहीं से धीरे-धीरे भक्तों को मंदिर की तरफ बढ़ना होता है। क्योंकि शनिवार और रविवार को भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है, कई बार स्थिति बिगड़ने लगती है। इसलिए कतार बद्ध तरीके से भक्त धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं। यदि आप बिहारी जी के दर्शन करने जाते हैं तो परिक्रमा मार्ग पर अन्य किसी मार्ग से मंदिर के लिए प्रवेश न करें। क्योंकि मंदिर तक पहुंचने के बाद आपको वापस लौटा दिया जाएगा। फिर करीब एक से दो किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ सकती है।

राज नारायण सिंह