सबसे बड़ी आस्था कैसे बन गई डाक कांवड़, भोले के भक्त कैसे करते हैं पूरी
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- July 19, 2023
भगवान भोलेनाथ दूब, जल, धतूरा, बेलपत्र से भी प्रसन्न हो जाते हैं, इसलिए भक्ति मार्ग में शिव को बहुत सहज, सरल माना गया है, मगर उनकी पूजा के लिए भक्त कठिन साधना भी करते हुए दिखाई देते हैं
भगवान भोलेनाथ दूब, जल, धतूरा, बेलपत्र से भी प्रसन्न हो जाते हैं, इसलिए भक्ति मार्ग में शिव को बहुत सहज, सरल माना गया है, मगर उनकी पूजा के लिए भक्त कठिन साधना भी करते हुए दिखाई देते हैं। शिवभक्त रावण ने भी भगवान भोलेनाथ की कठोर तपस्या की थी। सावन के महीने में भगवान शंकर के भक्त कांवड़ के माध्यम से अपनी आस्था की पुष्पांजलि भेंट करते हैं। बहुत से कांवड़िया है, जो कठिन साधना का पथ अपनाते हैं। उनका कहना है कि जिस शिव शंकर ने विश्व कल्याण के लिए कंठ में विष को धारण कर लिया उनकी भक्ति सहज और सरल तरीके से क्यों करें? भक्ति में त्याग, साधना और एकाग्रता का यदि संगम ना हो तो फिर शिव भक्ति कैसी? इसलिए सावन के महीने में शिव भक्त भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए डाक कांवड़ की कठोर साधना करते हुए दिखाई देते हैं। आज के समय में डाक कांवड़ से बड़ी तपस्या और कोई नहीं है। सवाल उठाता है कि आखिर सबसे बड़ी आस्था कैसे बन गई डाक कांवड़, भोले के भक्त कैसे करते हैं पूरी....?
इस प्रकार है डाक कांवड़ की परंपरा
सावन के महीने में कलश कांवड़, पिट्ठू कांवड़, जल कांवड़ आदि की मान्यता है। इसमें डाक कांवड़ अखंड संकल्प है। जिसमें शिव भक्त हरिद्वार से जल उठाते हैं और अपने शहर व गांव तक बिना रुके हुए दौड़ते हुए पहुंचते हैं। यहां भगवान भोलेनाथ को जल अर्पित करते हैं। अर्थात हरिद्वार से लेकर अपने गंतव्य तक जितनी दूरी होती है, उतनी दूरी शिव भक्त दौड़कर पूरी करते हैं। बहुत सी डाक कांवड़ की दूरी 300 किमी से लेकर 400 किमी तक होती है। इस दूरी को शिवभक्त लगातार दौड़कर पूरी करते हैं, इसमें उन्हें कहीं पर भी रुकना नहीं होता है। 24 घंटे से लेकर 30 घंटे तक लगातार डाक कांवड़ के शिवभक्त दौड़ते रहते हैं।
30 से 40 शिवभक्त होते हैं कांवड़ में
डाक कांवड़ में करीब 30 से 40 शिवभक्त होते हैं। साथ में एक बड़ी गाड़ी होती है। बाइक भी साथ में होती है। शिवभक्त गाड़ी से पहले हरिद्वार पहुंचते हैं। फिर यहां से जल लेने के बाद वह दौड़ना प्रारंभ कर देते हैं। फिर, अपने गंतव्य तक बिना रुके पहुंचते हैं। बाइक पर सवार शिव भक्त अपने साथी को सहारा देते रहते हैं। वह दौड़ रहे शिव भक्त तक बाइक पर बिठाए अपने साथी को लेकर पहुंचते हैं। बाइक से उतरकर शिव भक्त अपने साथी की कांवड़ को थामकर तेज से दौड़ लगाते हैं। इस क्रम से ही लगातार डाक कांवड़ चलती रहती है। शिव भक्त कांवड़ को लेकर पूरी रात और पूरे दिन दौड़ते रहते हैं। इनके लिए पूरा ट्रैफिक खाली करा दिया जाता है।
बहुत कठिन साधना है डाक कांवड़
डाक कांवड़ बहुत कठिन साधना है। 300 किमी तक लगातार दौड़ना आसान काम नहीं है। यह भक्ति की चरम सीमा है। शिव भक्तों को हरहाल में सावन में पड़ने वाली शिवरात्रि तक अपने गांव, कस्बे और नगर के शिव मंदिर तक पहुंचना होता है। यदि शिवरात्रि से कुछ घंटे पहले पहुंच गए तो उन्हें लगातार दौड़ना होता है, वह रुक नहीं सकते हैं। शिव रात्रि की तिथि आने पर ही वह जलाभिषेक के बाद रुकते हैं। शिवभक्तों की इतनी कठिन साधना देखकर हर कोई नतमस्तक हो जाता है।
दुनिया में मिलनी चाहिए पहचान
डाक कांवड़ मैराथन दौड़ से कहीं अधिक कठिन है, मगर मैराथन दौड़ को सारी दुनिया में पहचान मिली। डाक कांवड़ चर्चित नहीं हुई। हालांकि, भक्ति में कोई प्रसिद्धि और नाम की जरूरत नहीं होती है, मगर सनातन धर्म को जिस तरह से विगत वर्षों में दबाने की कोशिश की गई उससे डाक कांवड़ खास चर्चाओं में नहीं रही। यह सिर्फ हरिद्वार, मेरठ, दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि स्थानों तक ही चर्चित है। टीवी चैनल भी जिस प्रकार से अन्य धर्मों को दिखाते हैं, उस प्रकार से डाक कांवड़ की कवरेज नहीं करते हैं। अब साफ पता चल गया होगा की डाक कांवड़ सबसे बड़ा आस्था का केंद्र कैसे बनी और शिभक्त किस प्रकार से पूरी करते हैं।


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