नर्मदा के किनारे राम जानकी मंदिर में आखिर उल्टे हाथ की थाप क्यों लगाते हैं भक्त?

पावन, पुनीत मां नर्मदा के किनारे सैकड़ों मठ, मंदिर और आश्रम हैं, मगर राम जानकी कुटी में प्रवेश करते ही मानों साक्षात ठाकुरजी के दर्शन होते हैं। करीब 200 वर्ष पुरानी ये कुटी संतों 

पावन, पुनीत मां नर्मदा के किनारे सैकड़ों मठ, मंदिर और आश्रम हैं, मगर राम जानकी कुटी में प्रवेश करते ही मानों साक्षात ठाकुरजी के दर्शन होते हैं। करीब 200 वर्ष पुरानी ये कुटी संतों के चरण रज से धन्य हो रही हैं। कुटी में पूज्य हरिदास महाराज ने जीवित ही समाधि ले ली थी, तभी से राम जानकी कुटी का महत्व बढ़ता गया। पूज्य संतों की समाधि स्थल पर बहुत से लोग मनौती मानकर हल्दी के उल्टे थाप लगाते हैं। ऐसी मान्यता है कि पूज्य संत उनकी मनौती को जरूर पूर्ण करते हैं। बहुत सी महिलाएं बच्चे नहीं होने पर अपनी अर्जी लगाकर जाती हैं। मनौती पूर्ण होने पर हल्दी लगे सीधे हाथ की थाप लगाती हैं।  

अयोध्या से है मंदिर का जुड़ाव

मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के उदयपुरा तहसील के अंतर्गत बोरास गांव में नर्मदा मैया के तट के एकदम किनारे राम जानकी मंदिर है। यह पूज्य सिद्ध संतों की स्थली भी है। मंदिर का जुड़ाव प्रभु रामजी की नगरी अयोध्या से है। छोटी छावनी अयोध्या के अंतर्गत यह मंदिर आता है। मंदिर का भव्य और विशाल भवन है। वेद पाठशाला भी है, जहां बच्चों को वेद पुराण, आचार्य और धर्म शास्त्र का अध्ययन कराया जाता है। मंदिर परिसर में विशाल गोशाला भी है। गोचरण भी है, जहां गऊ माताएं आराम से विचरण करती हैं। 

200 वर्ष पुरानी चली आ रही है गुरु परंपरा

राम जानकी मंदिर बोरास कुटी में 200 वर्ष पुरानी गुरु परंपरा चली आ रही है। पूज्य हरिदास महाराज जी कठिन त्याग, तपस्या के लिए जाने जाते हैं। ऐसा बताया जाता है की पूज्य महाराज ने जीवित समाधि ले ली थी। इसलिए जो भी समाधि स्थल पर बड़े भाव से आता है, उसकी सभी मनोकामना जरूर पूर्ण होती है। इस प्रकार संतों की शृंखला अनवरत चलती रही। वर्तमान में मंदिर के पीठाधीश्वर बृज किशोर दास महाराज हैं। मंदिर को नई ऊंचाइयों की ओर ले जा रहे हैं। 

गुरुकुल की परंपरा देखने को मिलती है

मंदिर में आज भी अयोध्या की परंपरा का निर्वहन होता है। यहां की आरती देखते ही बनती है। शाम के समय आचार्यों के द्वारा वेद मंत्र गूंजते हैं। यह अद्भुत नजारा देखते ही बनता है। राम जानकी मंदिर हमारे ऋषि परंपराओं का भी गवाह है। यहां पढ़ने वाले छात्र आज भी जंगलों से लकड़ी बीन कर लाते हैं। स्वयं भोजन बनाते हैं। गुरुकुल जैसी परंपरा देखने को मिलती है। 

राजा दशरथ और माता कौशल्या भी विराजमान हैं

अमूमन मंदिरों में प्रभु राम, माता जानकी, लक्ष्मण जी और साथ में हनुमान जी विराजमान रहते हैं, मगर यहां राजा दशरथ और माता कौशल्या भी विराजमान हैं। मंदिर के पीठाधीश्वर बृज किशोर दास महाराज का कहना है जिस प्रकार बच्चों की देखरेख उनके माता पिताजी करते हैं, उसी प्रकार से राजा दशरथ और माता कौशल्या अपने बच्चों के साथ हैं। यह दर्शन सभी को अभिभूत कर देता है। मंदिर में तुलसी माता का चौक है, जो अपनी प्राचीन परंपरा से जोड़ता है। भगवान भोलेनाथ भी विराजमान हैं। रामभक्त हनुमान जी का भी भावपूर्ण दर्शन होता है। 


प्रकृति की विहंगम छटा देखने को मिलती है

राम जानकी मंदिर में प्रकृति की प्राकृतिक छटा देखने को मिलती है। मंदिर के पीछे घना वन है। इसमें आंवला, अमरूद, आम आदि वृक्ष भी हैं। प्राचीन नाग इमली का भी पेड़ देखने को मिलेगा, जो अब बहुत कम दिखाई देते हैं। मंदिर परिसर का इतना सुंदर वातावरण है कि यहां घंटों साधना की जा सकती है। यह पूरी तरह से रमणीय स्थल है। 

मां नर्मदा का दर्शन और मंदिर परिसर

मां नर्मदा के एकदम तट पर मंदिर  स्थित है। मां की परिक्रमा लगाने वाले संत, साधक मंदिर में आश्रय लेते हैं। मां की परिक्रमा अनवरत चलती रहती है। इसलिए मंदिर में संतों का आना जाना लगा रहता है। चौमासे में बहुत संत यहां विश्राम करते हैं, जब नर्मदा मैया का जल कुछ कम होता है, उसके बाद परिक्रमा प्रारंभ करते हैं। इसलिए राम जानकी मंदिर हमेशा तीर्थ स्थल बना रहता है।  

दुनिया के सिर्फ सनातन की फहरेगी धर्म ध्वजा

राम जानकी मंदिर के पीठाधीश्वर बृज किशोर दास महाराज जी का कहना है पूरी दुनिया में सिर्फ सनातन की ही विजय पताका फहराएगी। सैकड़ों वर्षों से हमने आक्रमण झेला। आतातायों का अत्याचार सहन किया। दुष्टों ने सनातन को नष्ट करने की कोशिश की मगर सनातन की जड़ों को कोई हिला नहीं सका। इसलिए दुनिया में किसी की हिम्मत नहीं है, जो सनातन को मिटा सके। अखिल विश्व में सिर्फ सत्य सनातन ही रहेगा।