जब बांके बिहारी जी स्वयं आए यमुनाजी के परली पार, लक्ष्मी को बालक के रूप में दिया दर्शन

 श्री यमुना जी श्री वृंदावन धाम को तीन ओर से घेरकर प्रवाहित हो रही हैं। श्री यमुना जी के परली पार पूर्व दिशा में एक बहुत ही सुंदर 'झील' है। जहां श्री राधा रानी का बहुत सुंदर मंदिर है उस झील का नाम है 'मानसरोवर'। वह बहुत ही एकांत और गंभीर स्थान है। श्री राधा रानी ने एक बार वहां पर मान लीला की थी। इस मानसरोवर के पश्चिम दिशा में दो कोस दूरी पर मांट गांव है। मांट गांव के निवासी आज भी दही- दूध बेचने के लिए श्री वृंदावन आते हैं। भगवान की दिव्य रासलीला में 'केवट लीला' में इस मांट गांव का उल्लेख मिलता है।


 स्वयं प्रगट हुए बिहारी जी

वही मांट गांव में रहने वाली एक कन्या की जिसने बाकें बिहारी जी महाराज से बड़ा ही अनोखा संबंध जोड़ा और स्वयं बिहारी जी महाराज को उसके भाव की पूर्ति के लिए आना पड़ा था। एक गृहस्थ परिवार में लक्ष्मी का जन्म हुआ था। किंतु उसकी छोटी अवस्था में ही उसकी मां का देहांत हो गया था और पिता ने दूसरा विवाह कर लिया था। इस प्रकार अपनी मां के साथ ही साथ अपने पिता के प्रेम से भी लक्ष्मी वंचित हो गई थी। जगत की दृष्टि से लक्ष्मी अनाथ सी हो गई थी। किंतु उसका यह दुर्भाग्य- "भगवान की भक्ति में उसको अग्रसर करने वाला था"। लक्ष्मी छोटी थी और अपनी सौतेली मां के द्वारा बताए हुए सभी कार्यों को बड़ी कुशलता पूर्वक संपन्न करती थी! किंतु समय मिलते ही भगवत- भजन में तल्लीन हो जाती थी।

कन्या को दर्शन कराने नहीं ले जाते थे

 पूर्णिमा ,अमावस, एकादशी आदि पर सभी गांव के लोग वृंदावन बांके बिहारी जी के दर्शन करने के लिए जाया करते थे। इसकी सौतेली मां और पिताजी भी जाते थे पर इसे कभी भी नहीं ले जाते थे। इसी से लक्ष्मी बिहारी जी महाराज से नित्य प्रार्थना करती थी कि ऐसा वह कौन सा दिन आएगा जब मैं आपका दर्शन कर सकूंगी? लक्ष्मी को बिहारी जी महाराज की प्रति बड़ा ही दृढ़ लगाव था और जहां -तहां श्री बिहारी जी की बात होती थी लक्ष्मी वहां जरूर जाया करती थी। एक बार की बात है लक्ष्मी जब अपने घर का सारा काम करके श्रीमद्भागवत की कथा सुनने के लिए गई तो वहां पर 'व्यास जी' ने बताया कि यदि हमें श्री बिहारी जी को पाना है तो (उनसे कोई ना कोई संबंध अवश्य बनाना होगा)। इससे बिहारी जी महाराज का शीघ्र ही दर्शन प्राप्त होता है। जैसे नंद -यशोदा ने उन्हें अपना पुत्र माना, ग्वाल वालों  ने उन्हें सखा माना और गोपियों ने पति भाव से उनकी आराधना  की। लक्ष्मी के मन में अब यह नया उत्साह जागृत हो गया था कि वह बिहारी जी महाराज से कौन सा संबंध कौन सा नाता जोड़े?


विवाह होकर लक्ष्मी आई वृंदावन

 इधर लक्ष्मी के विवाह की बात चलने लगी। पिता ने अनेक जगह उसके लिए योग्य वर ढूंढो किंतु रिश्ता वृंदावन के एक भक्त परिवार में 'नारायण' नाम के युवक के साथ लक्ष्मी का रिश्ता तय हो गया। जब यह बात लक्ष्मी को पता चली, तब वह बहुत प्रसन्न हुई कि अब तो मेरी शादी ही वृंदावन हो जाएगी। तो मैं तो बिहारी जी महाराज का नित्य ही दर्शन कर पाऊंगी। लक्ष्मी का विवाह बड़ी धूमधाम से संपन्न हो गया और विदा होकर वह वृंदावन भी आ गई। किंतु विवाह की धूम-धाम में कोई भी लक्ष्मी को श्री बिहारी जी का दर्शन करने के लिए नहीं लेकर के गया। और सामाजिक नियमानुसार लक्ष्मी पिता के घर मांट अपने गांव पुनः लौट कर आ गई।

पति के साथ गई लक्ष्मी

लक्ष्मी के गौना का मुहूर्त शीघ्र ही निकला। और लक्ष्मी का पति नारायण उसे लेने के लिए जब मांट गांव आया। तब लक्ष्मी ने एक बार श्री राधा रानी का दर्शन करके मानसरोवर में स्नान करके वृंदावन जाने की  इच्छा प्रकट की। लक्ष्मी की तरह ही उसका पति नारायण बहुत ही साधु स्वभाव वाला था उसने लक्ष्मी की प्रार्थना स्वीकार की। और दोनों श्री राधा रानी का दर्शन करने के लिए मानसरोवर में पधारे।
 
बिहारी जी स्वयं आयेंगे और भाभी कहकर पुकारेंगे

लक्ष्मी स्नान करके श्री राधा रानी के मंदिर के सामने बैठ गई और नारायण मानसरोवर में स्नान करने के लिए चला गया। इसी बीच लक्ष्मी का मन श्री बांके बिहारी जी के दर्शन के लिए बहुत बेचैन हो गया। लक्ष्मी ने मन में विचार आया कि बिहारी जी मुझे दर्शन क्यों देंगे क्योंकि अभी तक मैंने बिहारी जी से अपना कोई भी संबंध नहीं जोड़ा है!
तभी लक्ष्मी के मन में एक नहीं भावना की स्फूर्ति हुई। उसने सोचा की बिहारी जी महाराज की आयु कितनी वर्ष की होगी? जैसा कि संतों के मुख से सुना है बिहारी जी की आयु 8 से 16 वर्ष के बीच में होगी। और मेरे पति की आयु तो लगभग 20 वर्ष की होगी। श्री बांके बिहारी जी और मेरे पति दोनों ही वृंदावन वासी हैं और बांके बिहारी जी मेरे पति के छोटे भाई जैसे लगते है। (तो बांके बिहारी जी मेरे देवर हुए और मैं उनकी भाभी हुई)। इस प्रकार एक अनोखा भाव मन में संजोए लक्ष्मी सोच में डूब गई कि कभी बिहारी जी महाराज स्वयं आएंगे और मुझसे भाभी कहकर पुकारेंगे? 

छोटा सा बालक आया और लक्ष्मी से भाभी कहकर बोला

लक्ष्मी इसी प्रकार की भावना में खोई हुई थी। इतने में ही एक छोटा सा 8- 10 वर्ष का बालक लक्ष्मी के पास आ करके बोला -भाभी;भाभी मुझे अपना मुख तो दिखाओ। यह सुनकर लक्ष्मी सकुचा गई और उसने अपना घुंघट अपने दोनों हाथों से कस कर पकड़ लिया। क्योंकि बालक की मधुर ध्वनि से लक्ष्मी कुछ मुग्ध सी हो गई थी। बार-बार आग्रह करने पर भी लक्ष्मी ने जब अपना घुंघट ऊपर नहीं किया तो उस बालक ने एकाएक अपनी भाभी लक्ष्मी का घुंघट ऊपर कर दिया और फिर मंद मंद मुस्कुराता हुआ लक्ष्मी का चेहरा देखने लगा। लक्ष्मी ने भी एक झलक उस बालक की और देखा और लज्जा के कारण अपना घूंघट नीचे कर लिया। 

लक्ष्मी ने बिहारी जी के दर्शन में बालक का भी स्वरूप देखा

जब लक्ष्मी का पति नारायण स्नान करके लौटा तब लक्ष्मी ने कुछ क्रोध करते हुए कहा कि यहां के बालक तो  बहुत ढीठ है। पति के पूछने पर सारी बात कह सुनाई। पति ने भी क्रोधित होकर कहा कि यदि वह बालक दोबारा दिख जाए तो मुझे इशारा कर देना, मैं अच्छी तरह उसकी खबर लूंगा। श्री यमुना जी को पार करके दोनों श्री वृंदावन धाम पहुंचे। संध्या के समय लक्ष्मी और नारायण श्री बांके बिहारी जी का दर्शन करने के लिए मंदिर में गए। बिहारी जी महाराज के सामने पर्दा आया हुआ था। इधर जब लक्ष्मी ने अपना घुंघट ऊपर किया और बिहारी जी महाराज का पर्दा हटा तो लक्ष्मी जोर से चिल्लाई की "सुनो जी सुनो यही वह बालक है जो मुझे भाभी कह कर के पुकार रहा था और जिसने मेरा घूंघट जबरदस्ती ऊपर किया था"।


नारायण ने अपनी पत्नी के चरण पकड़ लिए

 बीच मंदिर में नारायण ने अपने पत्नी लक्ष्मी के चरण पकड़ लिए और कहा कि धन्य है तेरा भाव और धन्य है मेरे बांके बिहारी! जिन्होंने तेरे ऐसे भाव की पूर्ति की और तुझे भाभी कहकर पुकारा। स्वयं बांके बिहारी जी तेरे देवर हुए। बांके बिहारी जी से नारायण ने क्षमा मांगी कि उस दिन क्रोध वश मैंने कहा था कि मैं अच्छी तरह उस बालक की खबर लूंगा सो मुझे क्षमा करें दीनानाथ।
इस प्रकार दोनों बिहारी जी महाराज का दर्शन करते हुए बांके बिहारी जी महाराज को ना जाने कब तक निहारते रहे।