वृंदावन में टटिया स्थान, दुनिया में सर्वश्रेष्ठ भक्ति की है पहचान

वृंदावन वैसे तो भगवान श्री कृष्ण की लीलाएं हैं जिस स्थान पर भी जाएंगे आप कहीं ना कहीं भगवान श्रीकृष्ण से जुडी हुई बाल लीलाओं की कथाएं आपको मिल गजाएंगे मर एक ऐसा स्थान भी है

वृंदावन वैसे तो भगवान श्री कृष्ण की लीलाएं हैं, जहां भी जाएंगे आप कहीं ना कहीं भगवान श्रीकृष्ण से जुडी बाल लीलाओं की कथाएं मिल जाएंगी। मगर एक ऐसा स्थान भी है जो भक्ति के चरमोत्कर्ष पर ले जाता है, भक्ति के शिखर तक पहुंचाने का काम करता है, यह वृंदावन में परिक्रमा मार्ग पर टटिया स्थान के रूप में जाना जाता है। प्राकृतिक छटा से यह स्थान भरा हुआ है। इसीलिए भक्ति का सबसे सुंदर और अलौकिक स्थान के रूप में यह प्रसिद्ध है। आपको जानकर आश्चर्य होगा आज भी टटिया स्थान में लाइट नहीं है। आपको बिजली का कोई कनेक्शन टटिया स्थान में कहीं नहीं मिलेगा। शाम होते ही यह स्थान घनघोर अंधेरे में डूब जाता है और इसी के साथ भक्ति का रस धीरे-धीरे बढ़ता जाता है। दुनिया भर के लिए शोध का विषय है कि आधुनिक युग में जहां एक पल भी बिजली के बिना नहीं रहा जा सकता वहां पर टटिया स्थान में कैसे संत बिना लाइट के रहते हैं और तपस्या में लीन रहते हैं। बहुत सी अलौकिक कथाएं और कहानियां टटिया स्थान से जुड़ी हुई हैं। आइए आप भी यात्रा करिए इस पवित्र और उन स्थान का और कभी मौका मिले तो दर्शन करने वृंदावन जरूर आ जाइए। निश्चित मानिए आपकी भक्ति आप का भाव आपको यहां पर दंडवत करने को मजबूर कर देगा और आप नतमस्तक हो जाएंगे।

               स्वामी हरिदास संप्रदाय से है जुड़ाव

Tatiya baba ashram

वृंदावन में यमुना नदी से करीब एक किलोमीटर दूर परिक्रमा मार्ग पर टटिया स्थान है। केसी घाट, सुदामा कुटी होते हुए यदि आप परिक्रमा लगाते हुए आगे बढ़ेंगे तो तपोनोष्ठ संत देवराहा बाबा के नाम से विशाल द्वार मिलेगा। उस द्वार के एकदम ठीक सामने टटिया स्थान है। यह स्थान महान संगीतकार और राधा रानी की भक्ति में लीन स्वामी हरिदास संप्रदाय की परंपरा के अंतर्गत आता है। स्वामी हरिदास जी के आठ शिष्य हैं, उनमें से सातवें शिष्य ललित किशोरी देव जी हैं। उन्होंने यहां कठिन साधना की थी। उन्होंने ही टटिया स्थान को भक्तिमय कर दिया। ऐसा बताया जाता है कि वर्ष 1758 से लेकर 1830 तक महान संत ललित किशोरी देव जी ने यहां पर कठोर तपस्या की।

Tatiya sthan

इस प्रकार पड़ा टटिया स्थान 

परिक्रमा मार्ग पर टटिया स्थान के नामकरण की रोचक कहानी है। बताया जाता है कि वर्ष 1758 के समय स्वामी हरिदास महाराज जी के सातवें शिष्य ललित किशोरी देव जी यहां तपस्या करने आए। उस समय यहां चारों तरफ जंगल ही जंगल था। यमुना जी खूब उफान पर रहती थी। ऐसे में ललित किशोरी देव जी ने तपस्या करने का निर्णय लिया। उन्हें यह स्थान पसंद आ गया। मगर चारों तरफ से घेराबंदी के लिए उन्हें थोड़ी मेहनत करनी पड़ी। उन्होंने बांस की लकड़ी से धीरे-धीरे चारों तरफ घेराबंदी कर दी, जिससे कोई जंगली जानवर आदि ना आ सके और उसके बाद यहां साधना शुरू कर दी। चुकी बांस की लकड़ी से बने को टटिया कहां जाता है। इसीलिए इस स्थान का नाम टटिया स्थान पड़ गया। आज करीब 550 वर्ष से अधिक का समय व्यतीत हो जाने के बाद भी यह स्थान टटिया स्थान के नाम से ही प्रसिद्ध है।

Tatiya sthan sant darsan

यहां के संतों के रहस्य के बारे में कोई नहीं जान पाया

टटिया स्थान के संतो के रहस्य के बारे में कोई नहीं जान पाया है। यहां के संत कठोर साधना करते हैं उनकी साधना को देखकर आप भी नतमस्तक हो जाएंगे। यहां रज की पूजा होती है, इसलिए संत अपने चेहरे पर रज लपेटे रहते हैं। इससे उनके चेहरे को पहचानना मुश्किल होता है। संत के पास साधारण से वस्त्र होते हैं।अचला और कुर्ता ही धारण किए होते हैं। बहुत सारे संत ऐसे हैं जिनके पास सिर्फ एक अचला ही होता है। इन संतो में बहुत से ऐसे संत हैं जो तत्व ज्ञानी हैं जो कठिन साधना और तपस्या के माध्यम से साक्षात प्रभु से साक्षात्कार करते हैं। बहुत से ऐसे संत हैं जो डॉक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक रह चुके हैं, मगर जीवन की असलियत को जानने के बाद उन्होंने सब कुछ छोड़ दिया और फिर वह संत बनकर राधा रानी और ठाकुर जी की तपस्या में लीन हो गए।

Tatiya sthan ke ghankhor van

सादगी देख आपका जीवन धन्य हो जाएगा

टटिया स्थान की भक्ति और यहां की सादगी देखकर आपका जीवन धन्य हो जाएगा। यहां के संत एकदम सरल, साधारण और सहज रहते हैं। बहुत सारे संत के चरणों में पदवेश तक नहीं होता है। एक बांस की छड़ी आदि लेकर वह भ्रमण करते रहते हैं और भक्ति में लीन रहते हैं। अधिकांश संत किसी से बातचीत नहीं करते हैं और ना ही वह मीडिया के सामने आते हैं। यानी सांसारिक मोहमाया, लोक लुभावन दुनिया से एकदम दूर रहते हैं। यहां का प्रसाद भी बहुत स्वादिष्ट व भाव और भक्ति से भरा होता है। इसलिए सुबह के समय यहां प्रसाद ग्रहण करने वालों की लाइन लगी होती है। दिल्ली, मुंबई, गुजरात, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद और कर्नाटक आदि स्थानों से आकर भक्त बस प्रसाद ग्रहण करना चाहते हैं। प्रसाद के लिए साधारण तरीके से आपको जमीन पर बिठाया जाता है। रज में बैठकर आपको पत्तल में ही प्रसाद ग्रहण करना होता है प्रसाद में भक्ति भाव इतनी होती है कि एक बार अगर आपने प्रसाद ग्रहण कर लिया तो फिर आपका जीवन मानों धन्य हो जाएगा।

Tatiya ashram

 प्रतिदिन होता है संगीत, मन और चित हो जाता है शांत

टटिया स्थान पर प्रतिदिन शाम को संगीत होता है। प्राचीन समय के वाद्य यंत्र यहां आपको संगीत में देखने को मिलेंगे। सितार, सरोज आदि वाद्य यंत्र यहां मिलते हैं। सितार के संगीत के साथ स्वामी हरिदास संप्रदाय की परंपरा का संगीत यहां गूंज उठता है। जैसे-जैसे शाम ढलती जाती है जैसे तैसे संगीत का स्वर और साधना भक्ति में लीन होकर राधा रानी और ठाकुर जी के चरणों में अर्पित होता जाता है, बस मानो लगता है की बड़ी-बड़ी इमारतों बिल्डिंग व शहरों के बीच में एक ऐसे स्थान पर आ गए हैं जो आज भी घने वन की तरह लगता है जहां आधुनिकता दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती है।


ऐसे पहुंच सकते हैं टटिया स्थान

वृंदावन में परिक्रमा मार्ग स्थित टटिया स्थान पर पहुंचने के लिए कई रास्ते हैं मगर आप बाहर से आ रहे हैं तो सबसे पहले आपको मथुरा स्टेशन आना पड़ेगा। मथुरा स्टेशन से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर वृंदावन में परिक्रमा मार्ग पर टटिया स्थान है। आप मथुरा से अटला चुंगी होते हुए पानी घाट की ओर बढ़ेंगे पानी घाट से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर टटिया स्थान है। यदि आप अपने वाहन से आते हैं तो अलग-अलग मार्गों से आप पहुंच सकते हैं। प्रेम मंदिर, इस्कान मंदिर से भी करीब 5 से 6 किलोमीटर की दूरी पर टटिया स्थान पड़ेगा। दूसरा मार्ग आप केसी घाट की ओर से भी परिक्रमा लगाते हुए टटिया स्थान पहुंच सकते हैं। यदि आप मथुरा जिले के मांट से होकर आ रहे हैं तो आप पीपे वाले पुल से होते हुए आ सकते हैं। एक पुल केसी घाट से होकर आता है, जिससे आपकी कार जीप आदि आ सकती है। दूसरा पुल देवराहा बाबा आश्रम से होते हुए आता है जिस पर सिर्फ दो पहिया वाहन ही आ सकते हैं, इसलिए इस पुल से बड़ी गाड़ी से आप टटिया स्थान तक नहीं पहुंच सकते हैं। शहर के बीच से भी रास्ता है। कात्यानी देवी मंदिर से होते हुए भी बीचो-बीच टटिया स्थान पहुंचा जा सकता है।