मां नर्मदा की गोद में सीताराम आश्रम, जहां 24 वर्षों से हो रहा अखंड पाठ
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- May 22, 2023
पावन, पुण्य और अमृतमयी मां नर्मदा अपने बच्चों का सदैव कल्याण करतीं हैं।उनकी गोद में वात्सल्य है। इसलिए मां नर्मदा के आंचल के सहारे उनके लाखों पुत्रगण निरंतर परिक्रमा लगाते रहते हैं
पावन, पुण्य और अमृतमयी मां नर्मदा अपने बच्चों का सदैव कल्याण करतीं हैं। उनकी गोद में वात्सल्य है। इसलिए मां नर्मदा के आंचल के सहारे उनके लाखों पुत्रगण निरंतर परिक्रमा लगाते रहते हैं। मां के ही एकदम तट पर सीताराम आश्रम है, जो अखंड कीर्तन, अखंड ज्योति का गवाह है। धर्म की अलख जगाकर सनातन की परंपरा को और मजबूत कर रहा है। साथ ही अखंड सेवा के माध्यम से संतों और ऋषिगणों की सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहता है। यह आश्रम साक्षात ठाकुरजी का कृपा पात्र है। इसलिए इसका नाम ही सीताराम पड़ा। यहां अक्षय भंडार निरंतर चलता रहता है। 24 घंटे यहां पर प्रसाद की व्यवस्था रहती है, जो भी संत और ऋषि मां नर्मदा की परिक्रमा लगाकर निकलता है, वो सीताराम आश्रम की सेवा से जरूर कृतार्थ होता है। आइए, सीताराम आश्रम से जुड़कर हम भी मां नर्मदा का आशीर्वाद प्राप्त करें।
इस प्रकार पहुंच सकते हैं सीताराम आश्रम
मध्य प्रदेश के रायसेन जिले से होकर मां नर्मदा निकलती हैं। सीताराम आश्रम रायसेन जिले के उदयापुर तहसील के बौरास गांव के अंतर्गत आता है। आश्रम के एकदम निकट से होकर मां नर्मदा निकलती हैं। प्रत्येक सावन और भादों में मां नर्मदा सीताराम आश्रम को स्पर्श करने जरूर आती हैं। आज परम सौभाग्य है कि मां के पावन तट पर बैठकर सीताराम आश्रम की सेवा का बखान करने का अवसर प्राप्त हो रहा है। नर्मदा मैया के उस पार नरसिंह जिला आ जाता है। यदि आप सीताराम आश्रम आना चाहते हैं तो श्रीधाम सुपर फास्ट एक्सप्रेस से गाडरवारा स्टेशन तक आ सकते हैं। गाडरवारा से मां नर्मदा और सीताराम आश्रम बमुश्किल से 40 किमी दूर है। श्रीधाम ट्रेन दिल्ली से जबलपुर तक चलती है। वृंदावन, आगरा और झांसी आदि स्थानों से आसानी से सीताराम आश्रम पहुंचा जा सकता है।

ऐसे हुई सीताराम आश्रम की स्थापना
बात 1999 की है, एक संत मां नर्मदा की परिक्रमा करते हुए जा रहे थे। वह अयोध्या धाम के बताए जाते हैं। चौमासे बिताने के लिए संत महाराज बौरास गांव के निकट घने पेड़ों के नीचे रुक गए। सभी उन्हें बजरंग दास के नाम से पुकारने लगे। महाराज जी ने यहीं पर साधना करने की निर्णय लिया और तपस्या करने लगे। चौमास बीतने के बाद जब महाराज जी जाने लगे तो भक्तों ने उन्हें रोक लिया। बोलें, महाराज जी यहां से जाइए मत। भक्तों के भाव को देखकर संत महाराज जी बौरास गांव में मां नर्मदा के तट के निकट रुक गए। उसी समय से वहां पर अखंड सीताराम कीर्तन और श्रीराम चरितमानस का पाठ प्रारंभ कर दिया, जो निरंतर 24 वर्षों से चलता आ रहा है।
पूज्य महाराज जी ने सेवा की जगाई अलख
पूज्य बजरंग दास महाराज जी ने नर्मदा मैया के तट के किनारे निर्णय लिया कि अखंड कीर्तन के साथ सेवा की भी अलख जगाएंगे। इसके माध्यम से मां नर्मदा की परिक्रमा कर रहे संतो ऋषिगणों को प्रसाद की व्यवस्था की जाए। भजन कीर्तन और विश्राम की भी सुविधा यहां दी जाए। इसीलिए उन्होंने वर्ष 1999 में नर्मदा मैया के तट के किनारे सीताराम आश्रम का निर्माण किया। आश्रम में 24 घंटे संतो की सेवा की व्यवस्था रहती है। यहां 24 साल पहले प्रारंभ किए गए अक्षय भंडार ने विशाल रूप ले लिया है, जो निरंतर चलता रहता है। मां नर्मदा के आशीर्वाद से यह भंडार कभी समाप्त नहीं होता और प्रसाद की व्यवस्था निरंतर चलती रहती है।
बाल साधिका के रूप में आईं और बन गईं संत
वर्तमान में पूज्य बजरंग दास महाराज की सेवा और उनकी धर्म की अखंड ज्योति जगाने का काम माता सुमित्रा दास बखूबी कर रही हैं। बताया जाता है कि बचपन से ही सुमित्रा दास को पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यक्रमों में मन लगता रहता था। इसीलिए वह बालपन से सीताराम आश्रम आती रहती थीं। करीब 14 वर्ष की होंगी तब पूज्य बजरंग दास महाराज जी ने संतों की सेवा के लिए उनसे आग्रह किया। पूज्य महाराज जी के आग्रह को बालिका इनकार न कर सकी। इस प्रकार बालिका ने अपना पूरा जीवन धर्म और सेवा के लिए समर्पित कर दिया। आज मां नर्मदा के तट पर सीताराम आश्रम की संचालिका के रूप में हैं। सुमित्रा दास माता अपने पूज्य गुरुदेव बजरंग दास की तरह धर्म की ज्योति और अखंड कीर्तन की अलख जगाए हुए हैं।

प्रेरणा पुंज है सीताराम आश्रम
सीताराम आश्रम भक्ति और सेवा का प्रेरणा पुंज है। इसलिए मां नर्मदा के तट पर जो भी भक्त एक बार आता है, वह सीताराम आश्रम से जुड़ जाता है। माता सुमित्रा दास जी का निश्चल भाव और उनकी भक्ति देखकर हर कोई प्रभावित हो जाता है। हां, यहां निरंतर चल रहे कीर्तन का सहभागी जरूर बनना चाहता है। माता सुमित्रा दास के आशीर्वाद से नई पीढ़ी भी भक्ति से जुड़ रही है। आश्रम में आने के बाद पूज्य संतों के प्रसाद की सेवा में सब जुट जाते हैं। कीर्तन में शामिल होते हैं और रामचरितमानस का पाठ भी करते हैं। धीरे-धीरे बच्चों के अंदर भी सनातन धर्म के संस्कार का बीजारोपण हो रहा है।




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