1.70 लाख धार्मिक पुस्तकें बांटने वाले संत आखिर क्यों हैं चर्चा में?
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- June 2, 2023
अमूमन हम सब संत महात्माओं को कथाओं और धार्मिक आयोजन से जोड़कर मानते हैं। हमारे जेहन में यही सवाल कौंधता है की संत महाराज कथा भागवत पूजन पाठ आदि के बारे में बताते हैं। मगर आज एक ऐसे
अमूमन हम सब संत महात्माओं को कथाओं और धार्मिक आयोजन से जोड़कर मानते हैं। हमारे जेहन में यही सवाल कौंधता है की संत महाराज कथा, भागवत, पूजन पाठ आदि के बारे में बताते हैं। मगर, आज एक ऐसे संत के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं जिन्होंने 1.70 लाख धार्मिक पुस्तकें बांट दी। इनमें से भी अधिकांश पुस्तकें उन्होंने स्वयं लिखीं हैं। पूज्य संत महाराज का कहना है कि आशीर्वाद देने से ज्यादा जरूरी है कि धार्मिक पुस्तकों को समाज के लोगों तक पहुंचाया जाए, जिससे उनके जीवन में परिवर्तन सके। वह अपने धर्म और संस्कृति से जुड़ सकें। ये संत वृंदावन से करीब 70 किलोमीटर दूर अलीगढ़ के अटलपुर गांव में रहते हैं। पूज्य संत महाराज जी का बड़ा आश्रम है। यहीं से महाराज जी धार्मिक पुस्तकें लिखकर बांटते हैं। अभी तक 30 हजार से भी अधिक रामायण, रामचरित मानस और श्रीमदभागवत गीता भी बांट चुके हैं।
हितैषी बाबा के नाम से प्रसिद्ध हैं संत महाराज
पूज्य संत महाराज मनमोहन गिरी हितैषी बाबा के नाम से जाने जाते हैं। समाज के लोगों की मदद करना बाबा जी का मुख्य उद्देश्य है, इसलिए बाबा जी हितैषी बाबा के रूप में प्रसिद्ध हो गए। आप पूर्व कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा के विचारों से काफी प्रभावित थे। किशोरावस्था में ही गुलजारी लाल नंदा के संपर्क में आ गए थे। इसलिए उनके कहने पर ही आपने अपना पूरा जीवन समाज को समर्पित कर दिया और संत बन गए। काफी समय से हरियाणा प्रांत में रहे। अंत में भ्रमण करते हुए ब्रज क्षेत्र में पहुंच गए। यहां, हरिगढ़ जिले में अटलपुर गांव में 40 वर्ष पहले एक आश्रम का निर्माण कराया और समाज की सेवा में जुट गए। पूज्य हितैषी बाबा का कहना है कि गरीबों की मदद करना, समाज की बुराइयों को समाप्त करना ही सबसे बड़ी भक्ति है, जिसका परिणाम भले ही देर से ही सही पर दिखाई देता है। इसलिए भक्ति भाव के साथ भक्तों को सेवा भाव में भी लगाना चाहिए।
समाज सुधार के लिए लिखनी शुरू की पुस्तकें
हितैषी बाबा बताते हैं कि समाज को सुधारने के लिए उन्होंने पुस्तकें लिखनी शुरू की। उनका कहना है कि वह पहले प्रवचन किया करते थे, लोग उनकी बातों को सुनते थे और कुछ दिनों बाद ही भूल जाया करते थे। फिर हितैषी बाबा के मन में विचार आया कि क्यों ना समाज सुधार की पुस्तकें लिखीं जाएं? जिसके माध्यम से लोगों के जीवन में कुछ बदलाव आ सके। पूज्य बाबा जी ने 1980 में नैतिक शिक्षा नाम से पुस्तक लिखी। करीब 30000 पुस्तकें प्रकाशित कराकर उसे समाज के लोगों में बांटने का काम किया। बहुत से भक्त बाबा जी के पास पहुंचने लगे, जिन्होंने कहा कि पुस्तकें पढ़ने से उनके बच्चों के भीतर काफी परिवर्तन आया है। वो, अपने संस्कार से जुड़ने लगे हैं, उनके व्यवहार में भी काफी परिवर्तन आया है। बाबा जी कहते हैं उसके बाद से उनके अंदर संस्कार, संस्कृति और सनातन से जुड़ी पुस्तकें लिखने की जागृति पैदा हो गई और फिर उनकी कलम नहीं रुकी। आज 75 वर्ष की उम्र होने के बाद भी पुस्तकें लिख रहे हैं।
स्वयं बांटने का भी करते हैं काम
हितैषी बाबा अभी तक 1.70 लाख पुस्तकें बांट चुके हैं। एक संत के पास पुस्तक प्रकाशित करने के लिए पैसे कहां से आते हैं इस सवाल पर बाबाजी मुस्कुरा जाते हैं, वह कहते हैं की भक्तों से दान दक्षिणा नहीं लेते हैं, जो भक्त उन्हें कुछ देना चाहता है तो वह पुस्तक प्रकाशित कराने को कह देते हैं। इस प्रकार उनकी पुस्तकें प्रकाशित हो जाती हैं। अभी तक करीब 1.30 लाख पुस्तकें स्वयं द्वारा लिखी बांट चुके हैं। इसके अलावा 40 लाख धार्मिक पुस्तकें स्वयं खरीद कर बांट चुके हैं। बाबा जी का कहना है कि पुस्तकें भक्तों के घर, परिवार और रिश्तेदारों में बनी रहती हैं। कभी न कभी किसी के हाथ में जरूरआती हैं तो उसे लोग पढ़ते हैं। इस प्रकार उसकी कुछ बातें ग्रहण करते हैं, जिसके उसके जीवन में परिवर्तन आता है। इसलिए मुझे लगता है कि विचारों को अगर समाज तक ले जाना है तो धार्मिक और नैतिक शिक्षा से जुड़ी हुई पुस्तकें बहुत जरूरी हैं।

गांव में मांगकर करते हैं प्रसाद ग्रहण
पूज्य बाबा जी का अटलपुर में विशाल आश्रम है। आश्रम में खाने पीने की पूरी सामग्री है। फल और मिष्ठान भरा रहता है। मगर, बाबाजी प्रतिदिन गांव में मांग कर भोजन ग्रहण करते हैं। बाबा जी का कहना है कि गांव में प्रत्येक परिवार से एक-एक दिन उनके पास भोजन आया करता है और इस प्रकार वह भोजन ग्रहण करते हैं। इससे गांव के लोगों में प्रेम और व्यवहार भी बना रहता है और अपनत्व की भावना भी बनी रहती है। बाबाजी प्रतिदिन सिर्फ चार रोटी और दाल का प्रसाद ग्रहण करते हैं। अन्य कोई सामग्री भोजन में नहीं लेते हैं। उनके पास यदि कोई दान दक्षिणा बहुत आग्रह पर भी जाता है तो वह भी समाज के जरूरतमंद लोगों में बांट देते हैं। पूज्य बाबा जी का कहना है कि संत होकर यदि संग्रह करेंगे तो फिर उनका संत बने रहना ठीक नहीं है। इसलिए जो भी समाज के द्वारा आता है तो समाज को ही अर्पित कर देते हैं।




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