इसी पेड़ पर चढ़ कर भगवान श्रीकृष्ण बजाते थे बंशी, दौड़ी चली आती थीं गऊ माताएं

ब्रज भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से भरा हुआ है। खासकर बाल स्वरूप कन्हैया ने यहां अनेक लीलाओं के माध्यम से ग्वाल बाल और अपने सखाओं को आनंदित किया है। बचपन में  में भगवान श्रीकृष्ण

ब्रज भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से भरा हुआ है। खासकर बाल स्वरूप कन्हैया ने यहां अनेक लीलाओं के माध्यम से ग्वाल बाल और अपने सखाओं को आनंदित किया है। बचपन में  में भगवान श्रीकृष्ण जिस स्थान पर गऊ माताओं को चराने ले जाते  थे, उस स्थान को गौचारण कहते हैं। ब्रज के विशाल क्षेत्र में प्रभु गऊ माता को चराया करते थे। उन्हीं में से एक स्थान वंशीवट भी है। यहां विशाल वंशी का पेड़ है, इस पेड़ पर चढ़ कर भगवान श्रीकृष्ण वंशी बजाकर गाय और बछड़ों को बुलाया करते थे। इसलिए इस स्थान का नाम वंशीवट पड़ गया। आज भी इस वंशी के पेड़ पर कान लगाने से वंशी की आवाज आती है। देशभर से श्रद्धालु यहां पेड़ के दर्शन करने आते हैं। 

नंदगांव से गाय और बछड़ों को लेकर पहुंचते थे कन्हैया

वंशीवट 84 कोसी परिक्रमा के निकट है। ये यमुना के किनारे है और घनघोर जंगल है। कंस के अत्याचार से भयभीत होकर वासुदेव अपने कन्हैया को गोकुल नंद बाबा के घर छोड़ आए थे मगर कंस का जब अत्याचार बढ़ता चला गया तो नंद बाबा को भी गोकुल छोड़ना पड़ा और वह बरसाना के निकट एक निर्जन स्थान पर आ गए  इसका नाम नंद गांव पड़ा और नंद बाबा के नाम से यह गांव प्रसिद्ध हो गया। कन्हैया नंदगांव से वंशीवट गऊ गाय और बछड़ों को लेकर पहुंचते थे। 

 वंशीवट में पेड़ पर चढ़कर बुलाते हैं कन्हैया

द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण अपनी गाय और बछड़ों को चराने के लिए आया करते थे। नंदगांव से वंशीवट में घने जंगलों में वह अपने ग्वाल बालों के संग गाय चराया करते थे। इस दौरान गऊ माताएं चरते चरते काफी दूर निकल जाया करती थीं। फिर उन्हें आवाज देकर बुलाना बहुत मुश्किल होता था, इसलिए कन्हैया वंशीवट में बरगद के पेड़ पर चढ़ जाया करते थे, वहां वंशी की मधुर तान छेड़ देते थे, इससे गऊ माताओं को पता चल जाता था कि कन्हैया उन्हें घर चलने के लिए बुला रहे हैं। फिर सभी गऊ माताएं वापस घर चलना शुरु कर देती थीं। गौ माताओं के चलने से गोधूलि से ऐसा लगता था कि जैसे चारों तरफ अंधेरा छा गया है। कन्हैया गोधूलि में पूरी तरह से ढक जाया करते थे, उनका स्वरूप श्याम वर्ण था। गोधूलि में कन्हैया का रंग सुनहरा हो जाता था। यशोदा मैया इस रूप को देखकर निहाल हो जाया करती थीं।

आज भी होती है अनुभूति, सुनाई देती है वंशी

आज भी वंशीवट में बरगद के पेड़ मौजूद है। करीब 5500 वर्ष पुराना यह प्राचीन पेड़। द्वापर युग की याद दिलाता है। पेड़ पर कान लगाने से महसूस हो जाता है कि उसमें से वंशी ढोल झांझ आदि आज की आवाज सुनाई दे रही है। ऐसा बताया जाता है कि भगवान श्री कृष्ण की महिमा वंशीवट में आज भी व्याप्त है। इसलिए लोगों को आज भी वाद्य यंत्रों की अनुभूति होती है।।


ऐसे पहुंचे वंशीवट

वंशीवट मथुरा जिले के मांट तहसील के अंतर्गत आता है। वृंदावन से करीब 12 किलोमीटर की दूरी पर है यह 84 कोसी परिक्रमा के एकदम निकट है। मथुरा स्टेशन से उतरने पर आप सबसे पहले वृंदावन पहुंचे। यहां से पानी गांव पुल होते हुए मांट तहसील होते हुए वंशीवट पहुंचे। इसके अलावा वृंदावन से पीपे वाले पुल से भी वंशीवट पहुंचा जा सकता है।  यह पुल केसी घाट और देवराहा बाबा घाट पर बना हुआ है। हालांकि केसी घाट पुल से चार पहिए की छोटी गाड़ियां निकल जाती हैं। इसलिए सबसे सुगम और सरल रास्ता केसी घाट होते हुए भी जाता है।