कुसुम सरोवर जहां राधाजी अपने कन्हैया के लिए चुनने आती थीं पुष्प
- 643
- June 8, 2023
गोवर्धन की तलहटी में एक ऐसा सरोवर भी है, जिसकी सुंदरता को देखकर हर कोई मोहित हो जाता है। रात में तो यह सरोवर स्वर्ग सा लगता है। सरोवर के निकट बना भवन जब रोशनी से नहा उठता है
गोवर्धन की तलहटी में एक ऐसा सरोवर भी है, जिसकी सुंदरता को देखकर हर कोई मोहित हो जाता है। रात में तो यह सरोवर स्वर्ग सा लगता है। सरोवर के निकट बना भवन जब रोशनी से नहा उठता है तो फिर इसकी सुंदरता देखते ही बनती है। गोवर्धन की तलहटी में स्थित ऐसे सुंदर सरोवर को देखकर हर कोई आश्चर्यचकित रह जाता है। ऐसा बताया जाता है कि यहीं पर राधा रानी भगवान श्रीकृष्ण के लिए फूल चुनने आया करती थीं। इसी बहाने वह भगवान श्रीकृष्ण से मुलाकात करती थीं। 18 वीं शताब्दी में सरोवर का निर्माण भरतपुर के राजा सूरजमल ने कराया था। तब से इसकी भव्यता और बढ़ती चली गई। गोवर्धन परिक्रमा करने जो भी भक्त आता है, वो सरोवर के बिना दर्शन के नहीं रहता है।

बरसाने से आया करती थीं राधा रानी
कुसुम सरोवर उत्तर प्रदेश जिले के मथुरा के गोवर्धन में स्थित है। यह राधा कुंड और मानसी गंगा के बीच में स्थिति है। कुसुम सरोवर विभिन्न प्रकार के फूलों से घिरा रहता है। दापरयुग में राधा रानी अपनी सहेलियों के लिए फूल चुनने के लिए बरसाने से आया करती थीं। चुपके से भगवान श्रीकृष्ण से मिलती थीं। फिर, राधा रानी कन्हैया से बातचीत करती थीं। एक बार तो फूल चुनते समय राधा रानी की चुनरी कांटों में उलझ गई। वह परेशान हो गईं और अपनी चुनरी छोड़ने लगीं। तभी कन्हैया माली का स्वरूप धर कर आ गए। उन्होंने राधा रानी की चुनरी को कांटों से निकाली। भगवान श्रीकृष्ण भी राधा जी के माला के लिए यहीं से फूल चुनते थे। अपने ग्वाल बाल और सखाओं के साथ यहां लुकाछिपी का खेल भी खेलते थे। आज भी सरोवर के पीछे घना वन है। पेड़ पौधे हैं, पुष्प की लताएं भी देखने को मिलती हैं।

नारद कुंड पर भक्ति सूत्र ग्रंथ की रचना हुई
कुसुम सरोवर के पास ही नारद कुंड है, जिसका जुड़ाव नारद जी से है। नारदजी ने नारद कुंड के पास ही भक्ति सूत्र ग्रंथ लिखे थे। तबसे यह सरोवर और भी पावन व पुण्य माना जाने लगा। सरोवर विशाल क्षेत्रफल में फैला हुआ है। सरोवर के पीछे ही 11 शिखर के भवन बने हुए हैं, जिसका निर्माण भरतपुर के राजा सूरजमल सिंह ने कराया था। बताया जाता है कि उन्होंने यह भवन अपने पिता जवाहर सिंह की याद में बनवाया था। सूरजमल कि यहां पर समाधि है। मुगलों के शासन काल में राजा सूरजमल इसी मार्ग से दिल्ली जाया करते थे। बताया जाता है कि यह स्थान देखकर वह मोहित हो गए और उन्होंने अपने सैनिकों से कुसुम सरोवर के पास ही पड़ाव डालने के लिए कहा। इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे सरोवर और भव्य भवन का निर्माण कराया, जिसकी भव्यता देखते ही बनती है।

परिक्रमा लगाने वाले भक्त हो जाते हैं अभिभूत
गोवर्धन महाराज की परिक्रमा का बहुत महत्व है। कुसुम सरोवर एकदम परिक्रमा मार्ग से सटा हुआ है। साथ ही यह सरोवर गिरिराज जी की तलहटी में है। इसलिए सरोवर का और भी महत्व बढ़ जाता है, जो भी भक्त गिरिराज महाराज जी की परिक्रमा लगाते हैं और वह दर्शन करना चाहते हैं तो वह कुसुम सरोवर होते हुए एकदम गिर्राज महाराज के निकट पहुंच जाते हैं। चारों तरफ धना वन और शांतिपूर्ण वातावरण देखकर मन भक्ति व भाव से भर जाता है। बहुत से साधक यहां ध्यान लगाते हैं। उन्हें अनुभूति होती है जैसे मानों राधा रानी इस वन विहार में अपने कन्हैया के लिए पुष्प तोड़ने आईं हों। सरोवर के निकट घना वन ध्यान और साधना का केंद्र बनता जा रहा है।

सरोवर की सुंदरता के आगे सब रंग फीका
जहां प्रेम और भक्ति का रंग मिल जाए वहां पर और कोई रंग कैसे ही चढ़ सकता है। ऐसा ही कुछ कुसुम सरोवर के साथ भी है। कुसुम सरोवर के निर्माण में स्थापत्य कला साफ दिखती है। शाम होते ही कुसुम सरोवर के भव्य भवन प्रकाश से नहा उठते हैं तो फिर इसकी सुंदरता देखते ही बनती है। कुसुम सरोवर के आगे देश की सुंदर से सुंदर इमारत का रंग फीका पड़ जाता है। ऐसा लगता है कि जैसे मानों साक्षात धरती पर स्वर्ग है। रोशनी में सरोवर की सुंदरता देखते ही बनती है, जो भी भक्त पहली बार सरोवर को देखता है वह अभिभूत हो जाता है। एक पल के लिए वह भूल जाता है कि वह धरती लोक पर है। इसीलिए विदेशी पर्यटकों को भी कुसुम सरोवर खूब लुभाता है।

Related Items