यहां तैयार होते हैं भविष्य के चाणक्य, भागवत के प्रसिद्ध विद्वान भी
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- June 16, 2023
श्रीधाम वृंदावन में भविष्य के चाणक्य का निर्माण होता है तो भागवत के प्रकांड विद्वान भी यहीं से बनकर निकलते हैं, जो देशभर सनातन का परचम लहराने का काम करते हैं।
श्रीधाम वृंदावन में भविष्य के चाणक्य का निर्माण होता है तो भागवत के प्रकांड विद्वान भी यहीं से बनकर निकलते हैं, जो देशभर सनातन का परचम लहराने का काम करते हैं। वृंदावन में बहुत से ऐसे स्थान हैं, जहां पर वेद, पुराण, धर्म शास्त्र, कर्मकांड आदि का अध्ययन होता है। विद्वान आचार्यों के माध्यम से विद्यार्थियों को अध्ययन कराया जाता है। साथ ही भागवत की भी तैयारी कराई जाती है। परिक्रमा मार्ग पर श्रीभागवत मंदिर है जहां पर आचार्य बद्रीश द्वारा भागवत, ज्योतिष और कर्मकांड की तैयारी कराई जाती है। यहां से प्रतिवर्ष सैकड़ों की संख्या में विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने के बाद देशभर में अलग अलग स्थानों पर पहुंचते हैं। विद्यार्थियों का आभामंडल देखते बनता है, इन्हें वेदमंत्र आदि बोलते आप देखेंगे तो आप भी आश्चर्यचकित रह जाएंगे। अपने बच्चों को आप भी श्री भागवत मंदिर में अध्ययन करा सकते हैं।

भविष्य का भारत कर रहे हैं निर्माण
श्रीधाम वृंदावन में परिक्रमा मार्ग पर गोपाल खार स्थित श्रीभागवत मंदिर है। यहां आचार्य बद्रीश कई वर्षों से विधार्थियों को वेद, पुराण, ज्योतिष, कर्मकांड आदि की शिक्षा दे रहे हैं। श्रीमद्भागवत का भी अध्ययन कराया जाता है। आचार्य बद्रीश कहते हैं कि आज के बच्चे आधुनिक शिक्षा की ओर तेजी से भाग रहे हैं, वह पढ़ लिख कर आईएस, पीसीएस, डॉक्टर और इंजीनियर बनना चाहते हैं। वेद पुराण की ओर कम लोग आ रहे हैं, मगर जब तक भारतीय संस्कृति की उनके अंदर पहचान नहीं होगी तब तक वह अच्छे डॉक्टर और इंजीनियर नहीं बन सकते हैं। इसके लिए कम से कम अपने वेद पुराणों का अध्ययन होना चाहिए। आचार बद्रीश ने दावा किया कि यदि जिस व्यक्ति ने भी अपने धर्म ग्रंथों का अध्ययन कर लिया वह समाज में नौकरी करते हुए भी धर्म और सेवा दोनों कार्यों से जुड़ा रहेगा। इसीलिए उन्होंने अपने यहां श्रीभागवत मंदिर की स्थापना की। यहां पर करीब 100 से अधिक विद्यार्थी, वेद, पुराण, धर्म शास्त्र, कर्मकांड का अध्ययन कर रहे हैं। 20 वर्ष से भी अधिक पुरानी है संस्था है, उनकी कोशिश है यह बच्चे पढ़ लिखकर भविष्य के भारत का निर्माण करें। जब यह अपने धर्म शास्त्र से परिपक्व होंगे तो फिर यह राष्ट्र में सनातन संस्कृति की विजय पताका फहरा सकेंगे। भविष्य में भारत और मजबूत होगा।

अपने संस्कारों से जोड़ने का होता है प्रयास
आचार्य बद्रीश ने बताया कि बच्चों को अपने संस्कारों से जोड़ना बहुत आवश्यक है। हमारे सनातन संस्कृति में 16 संस्कार प्रमुख हैं। सभी का वैदिक और वैज्ञानिक महत्व है। हालांकि, आज हम इन संस्कारों को भूलते जा रहे हैं, मगर विद्यार्थियों को अध्ययन में इन संस्कारों के बारे में बताया जाता है। इन संस्कारों में दीक्षा और जनेऊ संस्कार प्रमुख हैं, जिन्हें अध्ययन के बाद यहां पूर्ण कराया जाता है। बकायदा बच्चों का मुंडन होता है और जनेऊ धारण कराया जाता है। वेदमंत्रों के माध्यम से सारी प्रक्रियाएं पूरी होती हैं। दीक्षा के बाद विधार्थी भिक्षा मांगते हैं, जिससे उनकी अध्यात्मिक यात्रा प्रारंभ हो सके।

हर कोई ले सकता है दीक्षा
आचार्य बद्रीश कहते हैं कि अमूमन यह माना जाता है कि वेद विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थी ही सिर्फ दीक्षा ले सकते हैं, बाकी अन्य लोग दीक्षा नहीं ले सकते हैं। मगर ऐसा नहीं है, आप गुरु के स्थान पर पहुंचकर दीक्षा ले सकते हैं। हमारे यहां बहुत से ऐसे भक्त जुड़े हुए हैं, जिनके बच्चे इंग्लिश मीडियम में पढ़ाई करते हैं, मगर हम उन्हें भी दीक्षा देते हैं, जिससे बच्चों के अंदर संस्कार का बीजारोपण हो सके और वह पूरी उम्र अपनी सनातन संस्कृति से जुड़े रहे। आचार्य बद्रीश ने बताया कि बच्चों को अभी इंग्लिश मीडियम विद्यालयों से दूर नहीं किया जा सकता, लेकिन हमारे यहां गुरुकुल तैयार होने चाहिए, जहां आधुनिक शिक्षा के साथ वैदिक शिक्षा की व्यवस्था हो। जिससे वहां पर हर तरह की शिक्षा बच्चों को मिल सके और बच्चे संस्कार से भी जुड़ सकें। क्योंकि इंग्लिश मीडियम स्कूलों में भारतीय संस्कृति के बारे में कुछ नहीं बताया जाता और इससे बच्चे अपने संस्कार और संस्कृति से दूर होते जाते हैं।

इससे भी देश विदेश में कर सकते हैं यात्रा
आचार्य बद्रीश कहते हैं कि लोगों के मन में यह है कि केवल डॉक्टर और इंजीनियर ही अच्छे पैसे कमाते हैं, वेद, पुराण, धर्म और शास्त्र का अध्ययन करने वाले लोग लोगों का जीवन सामान्य रहता है, देसी भाषा में यदि कहा जाए तो समाज में उन्हें पंडित जी और आचार्य जी कहकर सामान्यतः पुकारा जाता है, मगर वेद पुराण का अध्ययन करने वाले हमारे विद्यार्थी देशभर में फैले हुए हैं। वह विदेशों में भी जाकर भागवत ज्योतिष आदि का प्रचार प्रसार कर रहे हैं। और वह बहुत बेहतर तरीके से अपना जीवन यापन कर रहे हैं। वेद पुराण और कर्मकांड ज्योतिष आदि का अध्ययन करने वाले ऐसा नहीं कि वह अर्थ से कमजोर हों, आज उनकी स्थिति डॉक्टर इंजीनियरों से भी कहीं अधिक बेहतर है

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